ये बछर पितर पाख के एक महिना बाद आही नवरात्रि, 165 बछर बाद बनत हे संयोग


ये बछर पितर पाख के एक महिना बाद आही नवरात्रि, 165 बछर बाद बनत हे संयोग
  11/09/2020  


केशव पाल तिल्दा-नेवरा। हर बछर पितृ पक्ष के समापन के अगले दिन ले नवरात्र आरंभ हो जथे। यानि कि पितृ अमावस्या के अगले दिन ले प्रतिपदा के संग शारदीय नवरात्र शुरू होथे। दूसर शब्द म सरल तरीका ले काहन त पितर खेदा के बिहान दिन ले शारदीय कुवांर नवरात्रि चालू होथे। जघा-जघा माता दुर्गा के मूर्ति बैठार के लोगन मनोकामना ज्योति प्रज्जवलित कर पूरा नौ दिन तक ले बड़ आस्था अउ उमंग के संग भक्ति के रंग म डूबे नजर आथे। पर ये साल अइसन नइ होवय। ज्योतिषाचार्य मन के अनुसार ये साल श्राद्ध पक्ष समाप्त होवत ही अधिक मास लग जही। अधिक मास लगे ले नवरात्र अउ पितृ पक्ष के बीच एक महीना के अंतर आ जही। इही कारण ये बछर कुवांर नवरात्रि पितर पाख के एक महीना बाद चालू होही। मतलब कि ये साल नवरात्रि 17 सितंबर ले नही बल्कि एक महिना बाद 17 अक्टूबर ले आरंभ होही। जानकार मन के अनुसार लीप ईयर अउ अधिकमास दोनों ही एक साल म होवत हे। अधिक मास हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक 3 साल म होथे।सूर्य अउ चंद्रमा के बीच संतुलन बने राहय इही कारण अधिमास होथे।

■ 165 बछर बाद अइसन अद्भुत संयोग

जानकर मन के बताय अनुसार लगभग 165 साल बाद अइसन संयोग बनत हे कि,पितृपक्ष के एक महिना बाद नवरात्रि चालू होही। लीप वर्ष होय के कारण अइसन होवत हे। ये बछर नवरात्र पितृपक्ष समाप्त होने के संग प्रतिपदा ले नहीं बल्कि येकर एक माह बाद शुरू होही। हर साल पितृ पक्ष म अमावस्या के अगले दिन प्रतिपदा ले नवरात्र प्रारंभ हो जवय। लेकिन ये बार श्राद्ध समाप्त होवत ही एक महिना के अधिमास लग जही।

■ काला कहिथे अधिमास ?

अधिमास ल ही अधिक मास,मलमास अउ पुरुषोत्तम मास घलो कहे जाथे। अइसन कहे जाथे कि एक सूर्य वर्ष 365 दिन अउ करीब 6 घंटा के होथे। जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिन के माने जाथे। दोनों वर्ष के बीच लगभग 11 दिन के अंतर होथे। ये अंतर ह तीन वर्ष म लगभग एक माह के बराबर हो जथे। इही अंतर ल दूर करे बर हर तीन साल म एक चंद्र मास अतिरिक्त आ जथे। जेला अतिरिक्त होय के कारण अधिकमास के नाम दे दिये जाथे। अधिकमास ल ही कुछ स्‍थान म मलमास घलो कहे जाथे। येकर वजह ये हे कि ये पूरा महीना म शुभ कार्य वर्जित रहिथे। ये पूरा माह म सूर्य संक्रांति नइ होय के कारण ये महीना मलिन मान लिये जाथे। ये कारण लोगन येला मलमास घलो कहिथे।मलमास म विवाह,मुंडन,गृहप्रवेश जैसे कोई भी शुभ कार्य नइ करे जाय। मलमास ल शुद्ध नइ मानें जाय।मान्यता के अनुसार अधिक मास म दान,पुण्य,व्रत,पूजा,उपास,साधना विशेष रूप ले करे जाथे। अधिक मास म करे पुण्य कार्य के खास महत्व होथे। काबर कि ये अवधि म देव सो जथे अउ देवोत्थान एकादशी के बाद ही देव जागृत होथे।

■ ये बछर हावय दो आश्विन मास

आश्विन मास ल क्वार या कुवांर महिना घलो कहे जाथे। ज्योतिषाचार्य मन के अनुसार ये साल दो अश्विनमास यानि दू ठन कुवांर महिना पड़त हे। अइसन अधिकमास होय के कारण होवत हे। पंचांग के अनुसार ये वर्ष आश्विन माह के अधिक मास होही यानि दो आश्विन माह होही। येकर सेती ये बार चातुर्मास जेन हमेशा चार महिना के होथे। वोहा अब पांच महिना के होही। कुवांर महिना म ही नवरात्रि अउ दशहरा जैसे तिहार होथे। पर अधिक मास लगे के कारण ही ये बार नवरात्रि,दशहरा अउ दीपावली जैसे तिहार मन काफी दिन बाद म मनाय जाही।

■ आखिर का हे येकर पौराणिक मान्यता ?

अइसन मान्यता हे कि,प्राचीन काल म हिरण्यकश्यप असुर ह घोर तपस्या करिस। जेकर ले खुश होके ब्रह्मा जी ह वोला वरदान मांगे बर कहिस। हिरण्यकश्यप ह कहिस कि मैं न दिन म मरँव,न रात म। आपके बनाए हुए 12 मास म घलो मोर मृत्यु झन होवय। येकर अलावा पृथ्वी,आकाश अउ पाताल म घलो मैं अमर राहँव। इंसान,जानवर,भगवान,अस्त्र-शस्त्र ले घलो मोर मौत झन होवय। घर अउ बाहर म घलो मैं झन मरँव। ब्रह्मा जी ह वोला ये वरदान दे दिस। जेकर बाद हिरण्यकश्यप अहंकार म चूर होगे। अउ लोगन मन म अत्याचार करे ल धर लिस। ब्रह्मा जी ल अपन वरदान दे के भूल सुरता आइस। वोहा भगवान विष्णु ले येकर हल पूछिस तब भगवान विष्णु ह हिरण्यकश्यप ल मारे बर 13 वाँ मास के निर्माण करिस। उही समय ले पुरुषोत्तम मास 32 महीना के बाद आथे।


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