ग्रामीण अंचल म विलुप्त होवत हे पारंपरिक सुआ नृत्य


ग्रामीण अंचल म विलुप्त होवत हे पारंपरिक सुआ नृत्य
  12/11/2020  


केशव पाल / तिल्दा-नेवरा

 

          छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल मन म देवारी के समय नाचने अउ गाने वाला पारंपरिक सुआ नृत्य अउ सुआ गीत के परंपरा अब धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार म पहुंच गेहे। दशरहा के बाद घर-घर म सुआ नर्तक दल के दस्तक शुरू हो जवय। जेहा अब दिखाई नइ देवत हे।
          जुन्ना समय ले ही इंहा सुआ नृत्य के परंपरा हे। गांव अउ शहर मन म सुआ नर्तक दल घर के आघू या अंगना म सुआ नाचे बर आथे। केवल महिला ही नहीं बल्कि छोटे-छोटे लईका मन के टोली घलो सुआ नाचे बर आथे। पर पाछू बछर ले ए परंपरा ह नंदावत जात हे। आधुनिकता के आघू अब परंपरा अउ संस्कृति ल बचाना बहुत मुश्किल होवत जात हे। पारंपरिक लोकगीत अउ लोकनृत्य मन के संरक्षण अउ एकर कलाकार मन ल प्रोत्साहन के जरूरत हे तभे एहा बचे रहि पाही।

टोकरी म रहिथे माटी के सुआ

          सुआ गीत मुख्य रूप ले छत्तीसगढ़ राज्य के गोंड़ स्त्री मन के नृत्य गीत आय। एला देवारी के पर्व म महिला मन के द्वारा घर-घर जाके गाये जाथे। माटी के सुआ बनाके ओला टोकरी म रखे रहिथे। तहान ओकर चारों ओर महिला मन के टोली ताली पीटत सुआ गीत गाथे अउ नृत्य करथे।

चाउर-पैसा देके करथे बिदा

          महिला या बालिका मन के टोली जब पारंपरिक वेशभूषा म सुआ नृत्य करे बर घर म पहुंचथे त नृत्य समाप्त होय के ओमन ल घर वाला मन के डहर ले चाउर,दार,पैसा आदि भेट स्वरूप देके पूरा सम्मान के संग बिदा करे जाथे। तहान नर्तक समूह दूसर घर के तरफ जाथे।


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