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लखमा का’बस्तरिया सच’ और कांग्रेस की सियासी दुविधा, बीजेपी का ‘फील गुड’ और लखमा का ‘लड्डू’

बस्तर की राजनीति में कवासी लखमा केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक प्रभाव हैं। धूर नक्सली इलाके बस्तर में लखमा की जमीनी पकड़ से हर कोई वाक़िफ़ है, शराब घोटाले में साल भर बाद जेल से रिहा होने के बाद विधानसभा में उनके हालिया बयान ने न केवल सदन का तापमान बढ़ा दिया है, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जब एक ऐसा नेता, जो खुद बस्तर की मिट्टी से उपजा हो और जिसने दशकों तक वहां के संघर्ष को करीब से देखा हो, यह स्वीकार करे कि “नक्सलवाद खत्म हो रहा है और लोग शांति से जी रहे हैं”, तो इसके मायने गहरे हो जाते हैं।

टाइगर का ‘शांति पाठ’
कवासी लखमा का बयान सुनकर ऐसा लगा मानो बस्तर के जंगलों से अचानक सफेद कबूतर उड़ने लगे हों। कल तक जो विपक्ष ‘फर्जी मुठभेड़’ और ‘बस्तर जल रहा है’ के नारों से विधानसभा की छत हिला देता था, आज उसी के सबसे बड़े ‘बस्तरिया शेर’ ने दहाड़ने के बजाय ‘शांति का राग’ छेड़ दिया। अब बेचारे बाकी कांग्रेसी विधायक समझ नहीं पा रहे कि मेज थपथपाएं या अपना सिर!

बीजेपी का ‘फील गुड’ और लखमा का ‘लड्डू’
सत्तापक्ष तो मानो इसी ताक में बैठा था। जैसे ही लखमा जी के मुंह से ‘शांति’ शब्द निकला, बीजेपी नेताओं के चेहरे ऐसे खिल गए जैसे किसी ने बिना मांगे ‘समर्थन पत्र’ दे दिया हो। कल तक जो बीजेपी लखमा जी को ‘घोटालों का मोहरा’ बता रही थी, आज वही उन्हें ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ का छोटा भाई मान रही है। राजनीति में ‘वॉशिंग मशीन’ तो पुरानी बात हो गई, अब तो ‘बयानों का साबुन’ ही दाग धोने के काम आ रहा है।

स्वीकारोक्ति या सियासत?
लखमा का यह बयान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए किसी ‘सर्टिफिकेट’ से कम नहीं है। विष्णुदेव साय सरकार और केंद्र की दोहरी रणनीति (ऑपरेशन और विकास) को विपक्ष के सबसे मुखर चेहरे से समर्थन मिलना, सत्तापक्ष के दावों को अभूतपूर्व मजबूती देता है। इसके पीछे के प्रमुख बिंदु गौर करने लायक हैं:

लखमा एक जमीन से जुड़े नेता हैं। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में बदलती हवा को नजरअंदाज करना उनके लिए राजनीतिक रूप से भी कठिन रहा होगा।हाल के दिनों में बीजेपी नेताओं द्वारा लखमा को घोटालों में ‘मोहरा’ बताए जाने और उनके प्रति नरम रुख दिखाने का असर शायद उनकी बयानबाजी में दिखने लगा है।एक तरफ कांग्रेस आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व नक्सल मोर्चे पर सरकार की नीति और आंकड़ों पर सवाल उठा रहा है, वहीं उनके अपने कद्दावर नेता का यह बयान पार्टी की लाइन को कमजोर करता है।

कांग्रेस के सामने खड़ी चुनौतियां
लखमा के इस बयान ने कांग्रेस को ‘धर्मसंकट’ में डाल दिया है। पार्टी के सामने अब दोहरी चुनौती है,यदि कांग्रेस लखमा के बयान को खारिज करती है, तो वह अपने सबसे बड़े आदिवासी चेहरे को झुठलाएगी। यदि इसे स्वीकार करती है, तो सरकार के खिलाफ उसके द्वारा उठाए गए ‘फर्जी सरेंडर’ और ‘नक्सल नीति’ के सवाल खुद-ब-खुद दम तोड़ देंगे।बस्तर में कांग्रेस की पकड़ का आधार वहां के स्थानीय मुद्दे रहे हैं। लखमा का “शांति की ओर बढ़ते बस्तर” का मंत्र बीजेपी के विकासवादी एजेंडे को हवा देता है, जिससे कांग्रेस का परंपरागत विरोध कमजोर पड़ सकता है।

कवासी लखमा का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि बस्तर की बदलती तस्वीर का वह सच है जिसे राजनीति के चश्मे से पूरी तरह ढका नहीं जा सकता। सत्तापक्ष के लिए यह ‘फील गुड’ फैक्टर है, तो कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का विषय। सवाल यह नहीं है कि लखमा ने क्या कहा, सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब भी अपने बस्तरिया नेता की आवाज को अनसुना कर नक्सलवाद के खात्मे पर संदेह की राजनीति जारी रख पाएगी? बस्तर अब गोलियों की गूंज से ज्यादा शांति की आहट को पसंद कर रहा है, और लखमा ने शायद इसी जनभावना को शब्दों में पिरोया है।

कवासी लखमा ने अनजाने में या जानबूझकर ही सही बीजेपी को एक ऐसा हथियार दे दिया है, जिससे कांग्रेस के लिए बस्तर में ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) बनाना अब और भी कठिन हो जाएगा।

अंत में सच तो यही है कि लखमा जी अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बीड़ी सुलगाई और धुआं रायपुर तक पहुंच गया। अब बस्तर में गोलियां चलें न चलें, विधानसभा में लखमा जी के इस ‘शांति बम’ के छर्रे लंबे समय तक चुभते रहेंगे।

बस्तर में शांति आई या नहीं, ये तो वहां का आदिवासी ही जाने, पर लखमा जी ने कांग्रेस की ‘नींद’ और बीजेपी की ‘उम्मीद’ दोनों को जगाकर यह साबित कर दिया कि— “टाइगर अभी जिंदा है, और मूड में भी है!”

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Navin Dewangan

नवीन देवांगन को 25 वर्षों से ज्यादा मीडिया क्षेत्र का अनुभव है, देश भर के विभिन्न मीडिया संस्थानों में काम करने के बाद news36live । Digital.TV.Media के फाउंडर और संपादक के रुप में काम कर रहे है, वे पत्रकारिता में स्नातक व प्रसारण पत्रकारिता में मास्टर ड्रिगी माखन लाल पत्रकारिता विवि से हासिल करने के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में अनवरत रुप से कार्य कर रहे है
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