आम आदमी की जेब और खास आदमी की राजनीति: ईंधन की कीमतों पर ‘क्रेडिट वॉर’ का सच


देश की अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ने वाले पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर जब भी केंद्र की ‘कैंची’ चलती है, तो उसकी गूंज केवल पेट्रोल पंपों के मीटर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सियासी गलियारों में एक नया ‘तूफान’ खड़ा कर देती है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये से घटाकर 3 रुपये करने और डीजल पर इसे पूरी तरह समाप्त करने का फैसला भी इसी कशमकश का केंद्र बन गया है।
राहत का सीधा गणित
आम आदमी के लिए यह फैसला किसी ‘बूस्टर डोज’ से कम नहीं है। डीजल पर एक्साइज ड्यूटी का शून्य होना केवल वाहन चालकों के लिए खुशी की बात नहीं है, बल्कि यह महंगाई की कमर तोड़ने वाला कदम साबित हो सकता है। भारत में माल ढुलाई का एक बड़ा हिस्सा डीजल चालित ट्रकों पर निर्भर है। जब ट्रांसपोर्टेशन की लागत गिरेगी, तो सब्जी से लेकर सीमेंट तक की कीमतों में नरमी आने की उम्मीद स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह फैसला जनहित में है, तो विपक्ष को इसमें ‘धोखा’ क्यों नजर आ रहा है?
विपक्ष की दलील और ‘कौड़ी’ का तर्क
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का यह कहना कि “जनता को एक कौड़ी की राहत नहीं मिलेगी,” दरअसल टैक्स के उस जटिल ढांचे की ओर इशारा करता है जिसे आम आदमी अक्सर समझ नहीं पाता। विपक्ष का तर्क अक्सर यह होता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरने के बावजूद, बेस प्राइस और सेस (Cess) के माध्यम से सरकारें अपना खजाना भरती रहती हैं। उनके अनुसार, यह कटौती ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
कल प्रधानमंत्री ने सभी मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की। आज मुख्यमंत्री राज्य में बैठकें कर रहे हैं। इससे समस्या की गंभीरता का पता चलता है। आने वाला समय सरकार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होने वाला है और इसके लिए कोई तैयारी नजर नहीं आ रही है।
— Bhupesh Baghel (@bhupeshbaghel) March 29, 2026
अगर कोई जिम्मेदार है तो वह प्रधानमंत्री… pic.twitter.com/5Ibqk9NwoS
सत्तापक्ष का पलटवार और अतीत का आइना
राजनीति में ‘याददाश्त’ बहुत मायने रखती है। वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने जिस तेजी से भूपेश बघेल को कोविड काल के दौरान बढ़े हुए वैट (VAT) की याद दिलाई, उसने बहस को ‘कथनी बनाम करनी’ की ओर मोड़ दिया है। भाजपा का सीधा आरोप है कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसने वैट बढ़ाकर जनता पर बोझ डाला, और अब जब केंद्र ने बड़ा त्याग किया है, तो कांग्रेस केवल ‘क्रेडिट वॉर’ और ‘आरोप-प्रत्यारोप’ में उलझी है।
आपकी इन्हीं हरकतों के कारण जनता ने लानत भेजकर आपको बाहर का रास्ता तो पहले ही दिखा दिया। फिर भी जनता जनार्दन को गुमराह करने से पहले अपना इतिहास तो याद कर लिया करें।
— OP Choudhary (@OPChoudhary_Ind) March 28, 2026
कोविड जैसी आपदा के समय जब पूरी दुनिया संकट से जूझ रही थी और लोग आर्थिक मुश्किलों में थे, तब आपने पेट्रोल पर वैट… pic.twitter.com/5xpf8zPYWM
सियासत के बीच पिसता ‘आम आदमी’
छत्तीसगढ़ की राजनीति में पेट्रोल-डीजल हमेशा से एक ‘सॉफ्ट टारगेट’ रहे हैं। यहाँ मुद्दा केवल एक्साइज ड्यूटी का नहीं, बल्कि राज्य के हिस्से के राजस्व का भी है।
जनता को क्या लाभ है? तत्काल प्रभाव से पेट्रोल-डीजल सस्ता होना।
विपक्ष को क्यों रास नहीं आ रहा? क्योंकि इससे सत्तापक्ष को ‘जन-हितैषी’ होने का एक बड़ा माइलेज मिल रहा है, जो विपक्ष की महंगाई विरोधी पिच को कमजोर करता है।
लोकतंत्र में स्वस्थ बहस जरूरी है, लेकिन जब मुद्दा जनता की जेब से जुड़ा हो, तो राजनीति के चश्मे को उतारकर देखना आवश्यक हो जाता है। केंद्र का यह फैसला निश्चित रूप से एक बड़ी वित्तीय राहत है। अब जिम्मेदारी राज्य सरकारों और बाजार की है कि वे इस कटौती का पूरा लाभ अंतिम व्यक्ति की थाली और जेब तक पहुँचने दें। ईंधन की कीमतों पर सियासत अपनी जगह है, लेकिन जनता फिलहाल उस ‘राहत’ को महसूस करना चाहती है जिसका वादा इस फैसले के साथ किया गया है।







