छत्तीसगढ़ राज्यसभा चुनाव 2026 : अंकगणित और राजनीतिक अस्तित्व की परीक्षा


छत्तीसगढ़ की राजनीति में आगामी 16 मार्च का दिन बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहा है। के.टी.एस. तुलसी और फूलोदेवी नेताम का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही दिल्ली की दहलीज पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने के लिए नए चेहरे तैयार हो रहे हैं। लेकिन इस बार का चुनाव 2024 के आम चुनाव और राज्य के बदले हुए सत्ता समीकरणों के बाद का पहला बड़ा शक्ति परीक्षण है, इस दफा भाजपा और कांग्रेस दोनों पर ही छत्तीसगढ़ से स्थानीय नेता को राज्यसभा भेजने का दबाव बना हुआ है जिससे मामला दिलचस्प बन गया है
90 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास 54 और कांग्रेस के पास 35 विधायक हैं। गणित स्पष्ट है एक सीट सत्तापक्ष (भाजपा) और एक सीट विपक्ष (कांग्रेस) के पास जाना लगभग तय है। यह स्थिति दोनों ही दलों को ‘सुरक्षित’ महसूस करा रही है, भाजपा ने अपने पत्ते खोल दिए है लेकिन कांग्रेस में अभी भी मंथन का दौर जारी है।
छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए यह राज्यसभा चुनाव केवल एक सीट जीतने का मामला नहीं है, बल्कि यह 2028 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछाने और संगठन के भीतर ‘संतुलन’ बनाने का एक बड़ा मौका है। भाजपा के पास 54 विधायकों का स्पष्ट बहुमत है, जिससे उसकी एक सीट पूरी तरह सुरक्षित है।
छत्तीसगढ़ भाजपा ने नामों की सूची आलाकमान को सौंप गेंद उनके पाले में डाल दी है,भाजपा के खेमे में सरोज पांडे से लेकर नारायण सिंह चंदेल जैसे नामों की चर्चा है। भाजपा के लिए यह सीट उन नेताओं को ‘एडजस्ट’ करने का जरिया बनेगी जो पिछले विधानसभा या लोकसभा चुनावों में किन्हीं कारणों से पीछे रह गए या जिन्होंने संगठन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भाजपा की तरफ़ से जिन नामों को दिल्ली भेजा गया है आइए उनके नफा नुक़सान पर पहले उन पर एक नज़र डालते है
सरोज पांडे (पूर्व सांसद व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष)
भाजपा की सबसे कद्दावर महिला नेत्री। अविभाजित मध्य प्रदेश में महापौर से लेकर विधायक, सांसद और राष्ट्रीय महामंत्री तक का सफर तय किया है।
राज्यसभा जाने के फायदे : सरोज पांडे एक प्रखर वक्ता हैं और दिल्ली के गलियारों में उनकी मजबूत पकड़ है। 2024 के लोकसभा चुनाव (कोरबा सीट) में हार के बाद, उन्हें राज्यसभा भेजकर पार्टी यह संदेश दे सकती है कि वह अपने जुझारू नेताओं को अकेला नहीं छोड़ती। महिला आरक्षण बिल के दौर में एक महिला चेहरे को प्राथमिकता देना भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से सही होगा।
नुकसान/चुनौती : पार्टी के भीतर ‘नए चेहरों’ को मौका देने की मांग उठ सकती है, क्योंकि वे पहले भी राज्यसभा रह चुकी हैं।
सतनामी समाज (SC) के प्रभावशाली नेता। अनुसूचित जाति वर्ग में उनकी अच्छी पैठ है।
राज्यसभा जाने के फायदे : छत्तीसगढ़ की राजनीति में अनुसूचित जाति (SC) वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। नवीन मारकंडेय को राज्यसभा भेजकर भाजपा इस बड़े वर्ग को सीधा संदेश दे सकती है, खासकर तब जब कांग्रेस भी इस वर्ग को साधने की कोशिश कर रही है।
नुकसान/चुनौती : उनका प्रोफाइल सरोज पांडे या अन्य दिग्गजों की तुलना में ‘स्थानीय’ ज्यादा है, संसद के बड़े मंच पर उनकी सक्रियता को लेकर आलाकमान विचार कर सकता है।
डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी (पूर्व मंत्री)
भाजपा के पुराने और विश्वसनीय चेहरा। मस्तूरी क्षेत्र से आते हैं और एससी वर्ग का बड़ा नेतृत्व करते हैं।
राज्यसभा जाने के फायदे: बांधी का लंबा राजनीतिक अनुभव और बेदाग छवि पार्टी के लिए प्लस पॉइंट है। अनुभवी चेहरे को राज्यसभा भेजकर भाजपा ऊपरी सदन में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकती है।
नुकसान/चुनौती : ‘पीढ़ी परिवर्तन’ की भाजपा की नई नीति उनके आड़े आ सकती है।
नारायण सिंह चंदेल (पूर्व नेता प्रतिपक्ष)
जांजगीर-चांपा क्षेत्र के बड़े नेता और ओबीसी (OBC) वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
राज्यसभा जाने के फायदे : विधानसभा चुनाव 2023 में हार के बाद उन्हें ‘पुनर्वास’ (Rehabilitation) की जरूरत है। वे संगठन के पुराने आदमी माने जाते हैं और संसदीय प्रक्रियाओं के अच्छे जानकार हैं।
नुकसान/चुनौती: चूंकि राज्य में पहले से ही कई मंत्री ओबीसी वर्ग से हैं, इसलिए क्या पार्टी एक और ओबीसी चेहरा दिल्ली भेजेगी? यह बड़ा सवाल है।
भाजपा के सामने मुख्य रणनीतिक ‘पेच’
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की कार्यशैली को देखें, तो वे अक्सर चौंकाने वाले नामों पर मुहर लगाते हैं। ऐसे में यहाँ दो संभावनाएँ बनती हैं, भाजपा एससी (SC) या एसटी (ST) वर्ग के किसी जमीनी कार्यकर्ता को मौका देकर सबको चौंका सकती है, ताकि आने वाले चुनावों में उस वर्ग का पूरा वोट हासिल किया जा सके, या फिर जिन नेताओं ने विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई लेकिन उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है।
भाजपा संभवत महिला (सरोज पांडे) या अनुसूचित जाति (नवीन मारकंडेय/बांधी) में से किसी एक को प्राथमिकता देगी। छत्तीसगढ़ में जिस तरह से भाजपा ‘जातिगत समीकरणों’ को साधकर सत्ता में आई है, राज्यसभा का यह चुनाव उसी सोशल इंजीनियरिंग का अगला चरण होगा।
कांग्रेस की ओर से संभावित दावेदार
कांग्रेस के भीतर कई दिग्गजों के नामों पर मंथन चल रहा है, जिनमें क्षेत्रीय संतुलन और अनुभव को प्राथमिकता दी जा सकती है, कांग्रेस की ओर से दीपक बैज, टीएस सिंह देव और नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत, धनेंद्र साहू में से किसी को राज्यसभा भेजने की बात सामने आ रही है. पहले कांग्रेस की ओर से भूपेश बघेल की चर्चाएं थीं, लेकिन उन्होंने ही खुद को इस दौड़ से दूर कर लिया है
चरणदास महंत : (नेता प्रतिपक्ष)
चरणदास महंत महंत जी वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं।
राज्यसभा जाने के फायदे : महंत के पास केंद्र में मंत्री रहने का लंबा अनुभव है। उनके राज्यसभा जाने से दिल्ली में छत्तीसगढ़ कांग्रेस की आवाज मजबूत होगी, उनके दिल्ली जाने से राज्य की राजनीति में नए चेहरों (जैसे उमेश पटेल या अन्य युवा नेता) को नेता प्रतिपक्ष बनने का मौका मिल सकता है, जिससे ‘पीढ़ी परिवर्तन’ की प्रक्रिया आसान होगी।
नुकसान/चुनौती : महंत एक मंझे हुए खिलाड़ी हैं। उनके जाने से विधानसभा में भाजपा के आक्रामक तेवरों का जवाब देने के लिए कांग्रेस के पास उनके कद का कोई दूसरा नेता फिलहाल नजर नहीं आता, ज़मीनी स्तर पर महंत का अपना एक बड़ा प्रभाव है; उनके जाने से कार्यकर्ताओं को लग सकता है कि बड़े नेता राज्य छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर देख रहे हैं।
दीपक बैज: (पीसीसी चीफ)
बैज वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) हैं और आदिवासी समाज का बड़ा चेहरा और युवा जोश से लबरेज है।
राज्यसभा जाने के फायदे : दीपक बैज को राज्यसभा भेजने से कांग्रेस यह संदेश दे सकती है कि वह आदिवासी नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट कर रही है,बैज अपनी आक्रामक शैली के लिए जाने जाते हैं। राज्यसभा में वे राज्य के मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठा सकते हैं।
नुकसान/चुनौती : दीपक बैज ने हाल ही में संगठन को समझने और संभालने की कोशिश की है। उनके हटने से संगठन फिर से गुटबाजी का शिकार हो सकता है,बैज बस्तर क्षेत्र से आते हैं। उनका राज्यसभा जाना मतलब बस्तर की सक्रिय राजनीति से उनकी दूरी बढ़ना, जिसका असर आने वाले स्थानीय चुनावों पर पड़ सकता है।
टी.एस. सिंहदेव
टी.एस. सिंहदेव पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री। उनके अनुभव और बौद्धिक क्षमता का उपयोग पार्टी राज्यसभा में करना चाहेगी। अपनी सौम्य छवि, बौद्धिक क्षमता और ‘जन घोषणा पत्र’ के रणनीतिकार के रूप में विख्यात। सरगुजा क्षेत्र में गहरा प्रभाव।
राज्यसभा जाने के फायदे : राज्यसभा की गरिमा और नीतिगत चर्चाओं के लिए सिंहदेव एक आदर्श चयन हो सकते हैं। उनके जाने से पार्टी के भीतर आंतरिक कलह शांत होने की संभावना रहेगी और एक अनुभवी चेहरा संसद में होगा।
नुकसान/चुनौती : पार्टी को यह देखना होगा कि क्या वह एक और ‘राजघराने’ के चेहरे को प्रतिनिधित्व देना चाहती है या किसी जमीनी कार्यकर्ता को।
धनेंद्र साहू
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समीकरण को साधने के लिए धनेंद्र साहू एक भरोसेमंद चेहरा हो सकते हैं। साहू समाज (राज्य का सबसे बड़ा वोट बैंक) के कद्दावर नेता और पार्टी के प्रति बेहद वफादार।
राज्यसभा जाने के फायदे : साहू समाज को साधने के लिए यह कांग्रेस का सबसे मास्टर स्ट्रोक हो सकता है। 2023 के चुनाव में साहू समाज का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर शिफ्ट हुआ था, जिसे वापस लाने में यह निर्णय सहायक हो सकता है।
नुकसान/चुनौती : उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक आक्रामक वक्ता के रूप में नहीं देखा जाता, जिससे संसद में पार्टी की आवाज वैसी मुखर न हो पाए जैसी बघेल के केस में हो सकती है।
अनीता शर्मा या कोई महिला चेहरा फूलोदेवी नेताम (वर्तमान सांसद – पुनरावृत्ति की संभावना)
चूंकि फूलोदेवी नेताम की सीट रिक्त हो रही है, पार्टी सामाजिक और लैंगिक संतुलन बनाए रखने के लिए किसी कद्दावर महिला नेत्री को मौका दे सकती है।फूलोदेवी नेताम आदिवासी चेहरा और महिला नेतृत्व। बस्तर संभाग से आती हैं
राज्यसभा जाने के फायदे : चूंकि रिक्त हो रही सीट उनकी ही है, उन्हें दोहराना बस्तर और आदिवासी कार्ड को मजबूती देगा। कांग्रेस यह संदेश दे सकती है कि वह अपने आदिवासी नेतृत्व पर भरोसा कायम रखे हुए है।
नुकसान/चुनौती : पार्टी में नए चेहरों को मौका देने की मांग उठ सकती है, खासकर तब जब कई पूर्व मंत्री और वरिष्ठ विधायक अब सदन से बाहर हैं।
छत्तीसगढ़ की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, कांग्रेस संभवतः किसी ऐसे चेहरे पर दांव लगाएगी जो 2028 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए वोट खींचने की क्षमता रखता हो। इसमें ओबीसी (OBC) फैक्टर सबसे निर्णायक साबित हो सकता है।
छत्तीसगढ़ से राज्यसभा जाने वाले ये दो चेहरे 2028 के अगले विधानसभा चुनाव की बिसात बिछाएंगे। जहाँ भाजपा अपनी सत्ता को और मजबूत करना चाहेगी, वहीं कांग्रेस के पास मौका है कि वह किसी ऐसे स्थानीय चेहरे को दिल्ली भेजे जो संसद में छत्तीसगढ़ की आवाज को प्रखरता से रख सके और राज्य में पार्टी की वापसी की जमीन तैयार करे,2026 का यह राज्यसभा चुनाव 2028 विधानसभा चुनाव की रणनीति से भी जुड़ा हुआ है. ऐसे में दोनों दल क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठनात्मक मजबूती को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन कर सकते हैं
राज्यसभा चुनाव 2026 कार्यक्रम : 16 मार्च को मतदान
26 फरवरी 2026: अधिसूचना जारी, 5 मार्च 2026: नामांकन की अंतिम तिथि6 मार्च 2026: नामांकन पत्रों की संवीक्षा, 9 मार्च 2026: नाम वापसी की अंतिम तिथि,16 मार्च 2026: सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान, 16 मार्च 2026: शाम 5 बजे से मतगणना, ं20 मार्च 2026: संपूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण








