छत्तीसगढ़ में पांच हजार से अधिक स्कूलों में लड़कियों के लिए नहीं है शौचालय, हाई कोर्ट ने कहा- ये शर्मनाक है, शिक्षा सचिव से मांगा व्यक्तिगत शपथ पत्र


छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में कमरों की जर्जर स्थिति और छात्राओं के लिए शौचालयों के अभाव पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इसे एक ‘प्रणालीगत विफलता’ करार देते हुए कहा कि कोर्ट के पुराने निर्देशों के बावजूद धरातल पर कोई संतोषजनक सुधार नहीं दिखा है।
कोर्ट की नाराजगी
जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि जनवरी 2025 से अब तक स्थिति जस की तस बनी हुई है,स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को अगली सुनवाई से पहले वस्तुस्थिति पर व्यक्तिगत हलफनामा (Affidavit) पेश करने का आदेश दिया गया है।
शौचालयों की स्थिति: ‘भयावह और शर्मनाक’
डिवीजन बेंच ने हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के U-DISE (2024-25) आंकड़ों का संज्ञान लिया। रिपोर्ट के मुताबिक,राज्य के लगभग 1,000 से अधिक स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय ही नहीं हैं,करीब 8,000 से अधिक विद्यालयों में शौचालय इतनी दयनीय स्थिति में हैं कि उनका उपयोग नहीं किया जा सकता,उचित व्यवस्था न होने के कारण छात्राओं और महिला शिक्षकों में मूत्र संक्रमण (UTI) के मामले सामने आ रहे हैं,अकेले न्यायधानी (बिलासपुर) जिले के 160 स्कूलों में शौचालय की गंभीर समस्या है, जबकि 200 स्कूलों में ये पूरी तरह अनुपयोगी हैं।
“लड़कियों के लिए अलग और कार्यात्मक शौचालयों का न होना न केवल उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि यह छात्राओं की स्कूल छोड़ने की दर (Drop-out rate) बढ़ने का एक प्रमुख कारण भी है।”
— डिवीजन बेंच, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट
आंकड़ों का आईना (U-DISE 2024-25)
रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि राज्य में स्कूलों के युक्तिकरण (Rationalization) के बाद अब कुल स्कूलों की संख्या लगभग 38,000 है, फिर भी हजारों स्कूलों में मूलभूत सुविधाएँ नदारद हैं।
| विवरण | आंकड़े (लगभग) |
| कुल नामांकित छात्राएं | 19.54 लाख |
| शौचालय विहीन स्कूल | 1,000+ |
| खराब/जर्जर शौचालय वाले स्कूल | 8,000+ |
| चालू शौचालय वाले स्कूल (लड़कियों के लिए) | 52,545 (कुल 54,715 में से) |
प्रशासनिक विफलता पर सवाल
हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य के सरकारी स्कूलों में 19.54 लाख छात्राएं पढ़ रही हैं। ऐसी स्थिति में बुनियादी सुविधाओं का अभाव महिला सशक्तिकरण के दावों पर सवालिया निशान लगाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति स्कूलों में प्रवेश को ‘अतिक्रमण’ मानने वाले कड़े कानूनों के बीच, स्कूलों के भीतर की व्यवस्था को सुधारना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।








