प्लास्टिक की गुड़िया ने दिलाई दुष्कर्म पीड़िता को न्याय, बिलासपुर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: इशारों में मिली गवाही पर मुहर


बिलासपुर उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। यह मामला एक मूक-बधिर महिला के साथ हुए दुष्कर्म से जुड़ा है, जहाँ पीड़िता की सांकेतिक गवाही ही न्याय का मुख्य आधार बनी।
यह मामला एक जन्म से मूक-बधिर युवती से जुड़ा है, जिसके साथ उसके ही रिश्तेदार ने उस समय दुष्कर्म किया, जब वह घर में अकेली थी। आरोपी ने उसकी असहायता का फायदा उठाया। घटना के बाद जब परिजन घर लौटे, तो पीड़िता ने इशारों में पूरी घटना बताई और आरोपी की पहचान की। इसके बाद मां की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
क्योंकि पीड़िता बोल या सुन नहीं सकती थी, इसलिए उसकी गवाही और घटना का विवरण दर्ज करना एक बड़ी कानूनी चुनौती थी। ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के हाव-भाव, संकेतों और दुभाषिये (Interpreter) की मदद से ली गई गवाही को विश्वसनीय माना और आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई।
आरोपी ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान निम्नलिखित प्रमुख बातें कहीं भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत, यदि कोई गवाह बोलने में असमर्थ है, तो वह संकेतों या लिखकर अपनी बात रख सकता है। इसे ‘मौखिक साक्ष्य’ के बराबर ही माना जाता है।कोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने बिना किसी विरोधाभास के पूरी घटना को संकेतों के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझाया। मेडिकल रिपोर्ट और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने भी इस गवाही की पुष्टि की।अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि शारीरिक अक्षमता किसी व्यक्ति को न्याय के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती।
यह फैसला न केवल अपराधी को सजा दिलाने के लिए जरूरी था, बल्कि यह भविष्य के लिए एक नजीर (Precedent) भी है। यह सुनिश्चित करता है कि दिव्यांगों के प्रति कानूनी प्रक्रिया अधिक सुलभ और मानवीय बनी रहे।अपराधी इस मुगालते में न रहें कि बोल न पाने वाले गवाह की कमजोरी का वे फायदा उठा सकते हैं।








