डेडलाइन 31 मार्च: क्या भारत वाकई नक्सलवाद के ‘लाल साये’ से मुक्त हो गया?


छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर दिल्ली के संसद भवन तक, आज एक ही तारीख की गूंज है—31 मार्च 2026। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा निर्धारित नक्सलवाद के सफाए की यह समयसीमा आज पूरी हो रही है। जहां एक ओर केंद्र सरकार इसे ‘नक्सल-मुक्त भारत’ की सिद्धि के रूप में देख रही है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की राजनीति में इस मुद्दे को लेकर आरोपों और प्रत्यारोपों की नई जंग छिड़ गई है।
संसद में हुंकार: “अब लगभग नक्सल-मुक्त है देश”
सोमवार को लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह का डेढ़ घंटे का भाषण किसी रिपोर्ट कार्ड से कम नहीं था। उन्होंने स्पष्ट रूप से दावा किया कि 31 मार्च 2026 तक का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। शाह ने आंकड़ों की बाजीगरी के बजाय जमीन पर हुए बदलावों पर जोर दिया। उनके भाषण के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार रहे:
- सफलता के आंकड़े: पिछले तीन वर्षों में 706 नक्सली मारे गए और 4,800 से अधिक ने आत्मसमर्पण किया। अब देश में केवल दो ही जिले नक्सल प्रभावित बचे हैं।
- विकास की पहुंच: बस्तर के उन गांवों में भी अब राशन कार्ड, आधार कार्ड और 5 किलो अनाज पहुंच रहा है, जो कभी केवल ‘परचों’ और ‘बंदूकों’ के लिए जाने जाते थे।
- विचारधारा पर प्रहार: शाह ने उन ‘अर्बन नक्सलियों’ और विचारकों को आड़े हाथों लिया जो नक्सलियों की तुलना भगत सिंह या बिरसा मुंडा से करते हैं। उन्होंने इसे “हिमाकत” करार देते हुए कहा कि लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ हथियार उठाने वालों की तुलना शहीदों से नहीं की जा सकती।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘प्रूफ’ का संग्राम
संसद में शाह के एक बयान ने छत्तीसगढ़ की सियासत में उबाल ला दिया है। उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर नक्सलियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए सीधा हमला बोला— “भूपेश बघेल को पूछो, प्रूफ दूं क्या।”
इस पर पलटवार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे ‘सरासर झूठ’ करार दिया। बघेल का तर्क है कि यदि केंद्र के पास कोई सबूत था, तो उसे पहले सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? उन्होंने याद दिलाया कि उनकी सरकार ने ही बस्तर के दुर्गम क्षेत्रों में वे सुरक्षा कैंप स्थापित किए थे, जिनके आधार पर आज की कार्रवाई संभव हो पा रही है। झीरम घाटी हमले का जिक्र करते हुए उन्होंने भावनात्मक कार्ड भी खेला कि जिस पार्टी ने अपने नेतृत्व को नक्सलवाद में खोया हो, वह उन्हें संरक्षण कैसे दे सकती है?
रायपुर प्रेस क्लब पर टिकी नजरें
आज का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा दोपहर 1 बजे रायपुर प्रेस क्लब में एक महत्वपूर्ण संवाद करने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि वे राज्य स्तर पर हुई कार्रवाइयों और भविष्य की उस रणनीति का खुलासा करेंगे, जो छत्तीसगढ़ को ‘शून्य नक्सल हिंसा’ वाले राज्य की श्रेणी में खड़ा करेगी।
दावों और हकीकत के बीच का रास्ता
31 मार्च 2026 की यह डेडलाइन कागजों पर तो समाप्त हो रही है, लेकिन चुनौती अब ‘सस्टेनेबल शांति’ यानी स्थायी अमन की है। अमित शाह के दावे के अनुसार भारत अब नक्सलवाद से लगभग मुक्त है, लेकिन बस्तर के अंदरूनी इलाकों में तैनात जवानों की मुस्तैदी और वहां के आदिवासियों के जीवन स्तर में आने वाला सुधार ही इस जीत का असली पैमाना होगा।
सियासी आरोप अपनी जगह हैं, पर छत्तीसगढ़ के लिए आज का दिन एक नई सुबह की उम्मीद जैसा है—जहां बंदूक की गूंज नहीं, बल्कि विकास की पदचाप सुनाई दे।








