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छत्तीसगढ़: नए धर्मांतरण कानून पर छिड़ा विवाद, ईसाई समाज ने राज्यपाल से की विधेयक वापस करने की मांग

छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा हाल ही में पारित ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026’ विवादों के घेरे में आ गया है। इस कानून के प्रावधानों को लेकर ईसाई समाज ने कड़ी आपत्ति जताई है। राजनांदगांव स्थित क्रिश्चियन वेलफेयर सोसायटी ने राज्यपाल के नाम पत्र लिखकर इस विधेयक को सरकार को पुनर्विचार हेतु वापस भेजने की अपील की है।

विधेयक के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति
सोसायटी ने आरोप लगाया है कि यह कानून निष्पक्ष न होकर विशेष धर्मों को लक्षित करने के उद्देश्य से बनाया गया प्रतीत होता है। पत्र में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को उठाया गया है:

चुनिंदा धर्मों का उल्लेख: शिकायत के अनुसार, विधेयक के पेज 7, अध्याय 3, कंडिका 3 में केवल ‘प्रीस्ट’, ‘मौलवी’ और ‘फादर’ जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया है। अन्य धर्मों के धर्मगुरुओं या अगुवों का नाम न होना इसे भेदभावपूर्ण बनाता है।

टारगेट करने का आरोप: ईसाई समाज का तर्क है कि कानून में शब्दावली का ऐसा चयन स्पष्ट करता है कि यह सिर्फ ईसाई और मुस्लिम समुदाय को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

दुरुपयोग की आशंका: सोसायटी का मानना है कि इस कानून का इस्तेमाल भविष्य में अल्पसंख्यकों को परेशान करने और प्रताड़ित करने के लिए किया जा सकता है।

“कानून जबरन धर्मांतरण के खिलाफ हो, मजहब के नहीं”
संस्था के अध्यक्ष क्रिस्टोफर पॉल और सचिव राजमसीह ने पत्र में स्पष्ट किया है कि कोई भी कानून सैद्धांतिक रूप से ‘जबरन धर्मांतरण’ को रोकने के लिए होना चाहिए, न कि किसी एक या दो मजहबों को निशाना बनाने के लिए।

राज्यपाल से हस्तक्षेप की अपील
सोसायटी ने राज्यपाल से निवेदन किया है कि वे इस विधेयक पर हस्ताक्षर न करें और जनहित व सामाजिक समरसता को ध्यान में रखते हुए इसे पुनर्विचार के लिए सरकार को वापस भेजें। पत्र में यह भी याद दिलाया गया है कि पूर्व में भी इसी तरह के संवेदनशील मामलों में पुनर्विचार के कदम उठाए गए हैं।

बता दे कि छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 19 मार्च 2026 को इस धर्मांतरण विरोधी विधेयक को पारित किया था, जिसका उद्देश्य राज्य में अवैध और प्रलोभन के माध्यम से होने वाले धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना है। हालांकि, अब इस पर कानूनी और सामाजिक बहस शुरू हो गई है।

क्या है नए क़ानून में
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने मार्च 2026 में ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित किया है, जो अवैध धर्मांतरण के खिलाफ अत्यंत सख्त है। नए कानून में जबरन, प्रलोभन या धोखे से धर्म परिवर्तन कराने पर 7 से 20 साल तक की जेल और ₹25 लाख तक का जुर्माना हो सकता है। सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में उम्रकैद का प्रावधान है।

छत्तीसगढ़ के नए धर्मांतरण कानून के मुख्य बिंदु:
सख्त सजा: अवैध धर्मांतरण पर 7-10 साल की जेल और कम से कम ₹5 लाख जुर्माना है।

विशेष वर्गों के लिए सजा: यदि पीड़ित महिला, नाबालिग, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से है, तो सजा 10-20 साल की जेल और न्यूनतम ₹10 लाख जुर्माना होगा।

सामूहिक धर्मांतरण: यदि दो या अधिक लोगों का धर्मांतरण कराया जाता है, तो दोषियों को 10 साल से आजीवन कारावास और ₹25 लाख से अधिक का जुर्माना हो सकता है।

शादी के लिए धर्म परिवर्तन: केवल शादी के उद्देश्य से किया गया धर्म परिवर्तन अवैध (शून्य) माना जाएगा। शादी के लिए धर्म बदलने से पहले प्रशासन को सूचित करना अनिवार्य है।

सरकारी कर्मचारियों के लिए सजा: दोषी पाए जाने पर सरकारी कर्मचारियों को 10 से 20 वर्ष की सजा हो सकती है।

मुआवजा: अवैध धर्मांतरण के पीड़ितों को अधिकतम ₹10 लाख तक का मुआवजा मिलेगा।

चंगाई सभाओं पर रोक: कानून में ‘चंगाई सभा’ (faith healing meetings) के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण पर भी रोक का प्रावधान है

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news36Desk

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