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ममता के सामने बड़ी चुनौती! कांग्रेस और मुस्लिम दलों ने खड़ा कर दिया बड़ा संकट, बंगाल चुनाव में क्या है TMC का प्लान

Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता करीब 30 प्रतिशत हैं, जो किसी भी सरकार के नतीजे को बनाने और बिगाड़ने के लिए काफी है. 15 सालों तक बंगाल की सत्ता में रहने वाली ममता बनर्जी मुस्लिमों को अपना कोर वोटर मानती हैं. हालांकि, मुस्लिम वोटर ज्यादातर टीएमसी के साथ रहते भी हैं. लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं. क्योंकि मुस्लिमों को साधने के लिए कांग्रेस और छोटे मुस्लिम दल प्रयास कर रहे हैं. ऐसे में ममता बनर्जी के लिए उनसे निपटना बड़ी चुनौती होगी. यानी की अब ममता को न सिर्फ भाजपा से निपटना है, बल्कि अपने कोर वोटरों को भी साधने का प्रयास करना है. फिलहाल, बंगाल में 30 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के वोटों को लुभाने की होड़ लगी हुई है.

ममता बनर्जी के सामने इस बार विधानसभा चुनाव में कई चुनौतियां हैं. जिनसे पार लगना ममता के लिए इतना आसान नहीं है. क्योंकि अल्पसंख्यकों को साधने के लिए कांग्रेस ने कमर कस ली है. कांग्रेस के साथ ही टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर ने भी हुंकार भरी है और मुस्लिमों को साधने का प्रयास कर रहे हैं. जिसके बाद बंगाल के अल्पसंख्यक मतदाताओं को लेकर चुनावी समीकरण में नई अनिश्चितता पैदा हो गई है. हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी के साथ गठबंधन भी कर लिया है.

नौशाद सिद्दीकी ने अल्पसंख्यकों को ‘दूध देने वाली गाय’ बताया

बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के सामने कई दलों से निपटने की चुनौतियां हैं. उनके सामने साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भंगर सीट से जीत दर्ज करने वाले इंडियन सेक्युलर फ्रंट युवा मुस्लिम पार्टी के अध्यक्ष भी नाराज चल रहे हैं. उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को चुनाव के दौरान इस्तेमाल होने वाली ‘दूध देने वाली गाय’ की तरह माना जाता है. इसके बाद सब भूल जाते हैं. इसके साथ ही उन्होंने टीएमसी पर भी विकास नहीं करने का आरोप लगाया है.

हुमायूं कबीर बने सबसे बड़ी चुनौती

ममता से सामने अल्पसंख्यकों के नेता हुमायूं कबीर सबसे बड़ी चुनौती बनकर डटे हैं. उन्होंने अपनी पार्टी का एआईएमआईएम से गठबंधन किया है और 100 से ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा है. यानी मुस्लिमों के लिए नया मंच तैयार कर दिया है. हुमायूं ने दावा किया है कि इस बार के चुनाव में वे किंगमेकर भी भूमिका में रहेंगे. हुमायूं ने भी टीएमसी को घेरते हुए मुसलमानों को उनका प्रतिनिधित्व नहीं देने का आरोप लगाया है.

क्या करेंगी ममता ?

ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए अल्पसंख्यक वोटरों को अपने पाले में बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है. ऐसे में ममता का पूरा फोकस अल्पसंख्यकों पर ही रह सकता है. उनको लुभाने के लिए भी ममता तैयारियों में जुट गई हैं. अगर मुस्लिम मतदाता ममता का साथ नहीं देते, तो उनके लिए सत्ता में वापसी करना बड़ी चुनौती होगी. फिलहाल, देखना यह होगा कि इस संकट से ममता कैसे उबर पाएंगी. हालांकि, उनकी पार्टी के नेताओं ने दावा किया है कि 15 सालों की तरह अल्पसंख्यक टीएमसी के साथ ही रहेंगे.

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Regional Desk

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