अस्पतालों में मौत का टैंक !… सेवा प्रदाताओं की असुरक्षा और व्यवस्था का मौन, लापरवाही या महज हादसा?


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में एक दर्दनाक हादसा सामने आया है, जहां अस्पताल के गटर की सफाई के दौरान तीन सफाई कर्मियों की मौत हो गई। इस घटना की पुष्टि अधिकारियों ने की है। बताया जा रहा है कि सफाई के दौरान जहरीली गैस के कारण तीनों कर्मी बेहोश हो गए, जिसके बाद उनकी मौत हो गई। घटना के बाद अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया और पूरे मामले ने गंभीर रूप ले लिया, मृतकों की पहचान गोविंद सेंद्रे, अनमोल मचकन और प्रशांत कुमार के रूप में हुई है, तीनों सिमरन सिटी निवासी हैं.
मध्यभारत का प्रतिष्ठित अस्पताल में तीन कर्मचारियों की असामयिक मृत्यु ने न केवल उनके परिवारों को उजाड़ दिया है, बल्कि शहर के चिकित्सा जगत की चमक-धमक के पीछे छिपे अंधेरे को भी उजागर कर दिया है। अस्पताल, जिन्हें हम ‘जीवन रक्षक’ संस्थानों के रूप में जानते हैं, यदि वही अपने कर्मचारियों के लिए काल का ग्रास बन जाएं, तो यह प्रबंधन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
लापरवाही या महज हादसा?
शुरुआती जानकारी के अनुसार, यह घटना सुरक्षा मानकों की अनदेखी का परिणाम प्रतीत होती है। चाहे वह मामला सेफ्टी टैंक की सफाई का हो, शॉर्ट सर्किट का या गैस रिसाव का—हर परिस्थिति में एक बात स्पष्ट है: ‘प्रोटोकॉल का अभाव’। किसी भी बड़े संस्थान में जोखिम भरे कार्यों के लिए ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP) निर्धारित होते हैं। क्या इन कर्मचारियों को आवश्यक सुरक्षा उपकरण दिए गए थे? क्या उन्हें आपातकालीन स्थितियों से निपटने का प्रशिक्षण मिला था? अक्सर निजी अस्पताल मुनाफे की होड़ में ‘बैकएंड’ कर्मचारियों की सुरक्षा को हाशिए पर धकेल देते हैं।
जवाबदेही किसकी?
अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद जांच समितियां बैठती हैं, मुआवजे का ऐलान होता है और समय के साथ धूल जम जाती है। लेकिन असली सवाल जवाबदेही का है।
क्या अस्पताल प्रबंधन पर कठोर कार्रवाई होगी?
क्या श्रम विभाग ने समय-समय पर इस अस्पताल का ‘सेफ्टी ऑडिट’ किया था?
क्या उन परिवारों की भरपाई महज चंद रुपयों से संभव है जिन्होंने अपने घर का कमाऊ सदस्य खो दिया?
एक चेतावनी की घंटी
रायपुर अब केवल एक शहर नहीं, बल्कि मध्य भारत का एक बड़ा मेडिकल सेंटर बन चुका है। ऐसे में यहाँ के अस्पतालों को विश्वस्तरीय सुरक्षा मानकों का पालन करना चाहिए। यह घटना राज्य के अन्य सभी छोटे-बड़े अस्पतालों के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ होनी चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर अस्पतालों का इंफ्रास्ट्रक्चर और लेबर सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य करे।
मरीजों की जान बचाना अस्पताल का धर्म है, लेकिन उन हाथों की सुरक्षा करना जो इस पूरी व्यवस्था को चलाते हैं, अस्पताल का अनिवार्य कर्तव्य है। इन तीन मौतों को महज एक आंकड़ा मानकर भुला देना उन श्रमवीरों के साथ अन्याय होगा। न्याय तभी होगा जब भविष्य में किसी और कर्मचारी को ‘ड्यूटी’ के नाम पर अपनी जान की बाजी न लगानी पड़े।







